बी.एस.टी.सी. (प्राथमिक स्तर के शिक्षक-प्रशिक्षणार्थी) में अध्ययनरत् महिला एवं पुरूष शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणाओं के स्तर का तुलनात्मक अध्ययन
श्रीमती सुमन गर्ग1, डाॅ.श्रीमती कमला वशिष्ठ2 एवं डाॅ. नरेन्द्र कुमार गर्ग3
1व्याख्याता, डी.सी.एस. शिक्षक प्रशिक्षण महिला महाविद्यालय, जयपुर (राजस्थान)
2निदेशक, स्कूल आफ एज्यूकेशन, जयपुर (राजस्थान)
3रीडर शिरडी साईं बाबा आयुर्वेदिक मेडिकल काॅलेज, रेनवाल (जयपुर ) राजस्थान .
शोध साार
पृष्ठभूमि इक्कसवीं सदी के उषाकाल में पर्यावरण संकट एक विश्वव्यापी संकट बनकर सामने खड़ा है। यूनेस्को ने अपने एक प्रलेख ’’थिंकिंग अहेड’’ में पर्यावरण संकट को मानव सभ्यता का संकट घोषित किया है। उद्देश्य बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत महिला एवं पुरूष शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणाओं के स्तर के आधार पर अध्ययन करना। न्यादर्श जयपुर क्षेत्र के ग्रामीण व शहरी बी.एस.टी.सी. महाविद्यालय के शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों को न्यादर्श के रूप में चुना है जिनकी संख्या 120 है। पर्यावरण अवधारणा उपलब्धि परीक्षण- डाॅ. एस.के. बावा, इंदीरवीर कौर द्वारा निर्मित उपलब्धि परीक्षण (ई.सी.ए.टी.) द्वारा किया।प्रदत्तों का विश्लेषण एवं निर्वचन क ित्र 1 का काई तालिका मूल्य .05 एवं .01 स्तर पर क्रमशः 3.41 एवं 6.34 है। गणना करने पर काई का मूल्य .04 प्राप्त हुआ। यह मूल्य काई तालिका मूल्य के दोनों ही स्तरों से कम है। अतः निराकरणीय परिकल्पना ‘‘ बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत् शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणा के स्तरों में समानताऐं नहीं हैं’’, को स्वीकृत किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत् छात्र व छात्राओं के पर्यावरण संबंधी अवधारणा में भिन्नताऐं नहीं है।
मुख्य शब्द - अवधारणाओं के स्तर, लिंग भेद
परिचय
भारतवर्ष में पर्यावरण की संचेतना कोई नया प्रत्यय नहीं है। यह हमारी भारतीय परंपरा और संस्कृति तथा पर्यावरण के पारस्परिक संबंधों में रची बसी है। प्रकृति के अंगों, उपांगों को देवता स्वरूप मानने की परंपरा वैकदक काल से रही है, सूर्य, नदी, पर्वत, आकाश, उषा, वरूण आदि को सम्मान देते हुए पूजनीय माना गया है-
’’अग्नि देवता, वायु देवता, सूर्य देवता, चन्द्रमा देवता
स्ववो देवता, बृहस्पति देवता, रूद्रो देवता
आदित्यः मरूतो देवता, विश्वे देवता
बृहस्पति र्देवतेन्द्र देवता, वरूणो देवता’’
उद्देश्य-बी.एस.टी.सी. (प्राथमिक स्तर के शिक्षक-प्रशिक्षणार्थी) में अध्ययनरत् महिला एवं पुरूष शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणाओं के स्तर का तुलनात्मक अध्ययन कर आवश्कतानुसार सुझाव प्रस्तुत करना।
अध्ययन विधि, न्यादर्श, उपकरण एवं सांख्यिकी
भूमिका
किसी भी अनुसंधान की सफलता एक बडी सीमा तक उसकी योजना एवं क्रियाविधि पर निर्भर करती है। एक सुनियोजित व योजना अनुसंधानकर्ता के मार्ग में आने वाली अनेक कठिनाईयों पर विजय प्राप्त करा देती है। अतः प्रस्तुत अध्याय में अध्ययन की योजना एवं उसकी विधि का वर्णन किया जा रहा है। अध्ययन किस प्रकार का होता है। प्रतिदर्श का चयन किस प्रकार किया गया है, इसमें प्रयुक्त विधियां क्या-क्या है तथा संग्रहित सामग्री के विश्लेषण करने में किस विधि का प्रयोग किया गया है आदि सभी बातों का यहां विस्तार सहित विवरण प्रस्तुत है।
प्रस्तुत अध्ययन में अपनाई गई विधि -सर्वेक्षण विधि
किसी भी कार्य को करने के लिए योजना बनाते समय यह निर्धारित किया जाता है कि किस कार्य के लिए कौनसी विधि उपयुक्त रहती है और प्रत्येक शोध कार्य के लिए एक निश्चित विधि की आवश्यकता होती है, जिसकी सहायता से निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति की जा सके। अध्ययन विधि से हमारा तात्पर्य ‘‘एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार निश्चित अध्ययन प्रणाली से है।’’ प्रस्तुत अध्ययन एक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन है, जिसमें सर्वेक्षण विधि को अपनाकर ‘‘जयपुर क्षेत्र के शहरी व ग्रामीण बी.एस.टी.सी. महाविद्यालय के शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों में पर्यावरण के प्रति अवधारणा का पता लगाया गया है।’’
सर्वेक्षण विधि का उद्देश्य किसी इकाई की वर्तमान व्यवस्था एवं तथ्यों का अध्ययन करना तथा भावी सुधार के लिए सुझाव प्रस्तुत करना होता है।
सर्वेक्षण विधि का अर्थ
सर्वेक्षण शब्द से ही स्पष्ट है कि समाज से संबंधित जनसंख्या का सूक्ष्य अवलोकन कर अपेक्षित जानकारी प्राप्त करना ही सर्वेक्षण है। सर्वेक्षण शब्द की उत्पत्ति मूल रूप से अंग्रेजी भाषा के दो शब्दों ष्ैनतष् तथा ष्टमपवतष् से हुई है क्रमशः ऊपर से और देखना। सर्वेक्षण में सर्वेक्षणकर्ता किसी घटना की उस स्थान पर प्रत्यक्ष जाकर जांच करता है तथा उसके बारे में खोज करता है।
सर्वेक्षण विधि की परिभाषाऐं
सर्वेक्षण से आशय उन सभी क्रियाओं से होता है जो सर्वेक्षणकर्ता द्वारा स्वयं घटना स्थल पर जाकर संपादित की जाती है।
हेरिसन के अनुसार, ‘‘सामाजिक सर्वेक्षण एक सहकारी प्रयत्न है जिसके अंतर्गत किसी विशेष भौगौलिक क्षेत्र में पायी जाने वाली सामाजिक दशाओं तथा समस्याओं के अध्ययन और विश्लेषण के लिए वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है।’’
बेबस्टर शब्दकोष के अनुसार, ‘‘वास्तविक जानकारी प्राप्त करने के लिए किया गया आलोचनात्मक निरीक्षण ही सामाजिक सर्वेक्षण होता है।’’
सर्वेक्षण विधि की विशेषताऐं
1. सर्वेक्षण विधि के अंतर्गत एक ही समय में बहुत सारे लोगों के बारे में आंकडे प्राप्त किये जा सकते हैं।
2. आवश्यक रूप से इसकी प्रकृति प्रतिखण्डात्मक होती है।
3. इसका संबंध व्यक्तियों से नहीं होता है।
4. इसके अंतर्गत स्पष्ट परिभाषित समस्या पर कार्य किया जाता है।
5. इसके निश्चित व विशिष्ट उद्देश्य होते हैं।
6. इसके आंकडों की व्याख्या एवं विश्लेषण में सावधानी आवश्यक होती है।
7. यह स्थानीय समस्याओं के बारे में उपयुक्त सूचनाऐं देता है।
8. यह भविष्य के विकास के क्रम मेें सूचना देता है।
9. यह वर्तमान नीतियों का निर्धारण करता है तथा वर्तमान समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है।
10. यह कई उपकरणों के निर्माण में सहायता करता है जिसके द्वारा हम शोध प्रक्रिया को पूरा करते हैं।
जनसंख्या
प्रत्येक शोध कार्य हेतु जनसंख्या का निर्धारण आवश्यक है क्योंकि इसी जनसंख्या से तथ्यों तथा प्रदत्तों का संकलन किया जाता है। सामान्यतः एक राष्ट्र या एक राज्य या एक नगर के कुल व्यक्तियों को जनसंख्या कहा जाता है लेकिन सांख्यिकी अनुसंधान में विशिष्ट विशेषता रखने वाले व्यक्तियों घटनाओें तथा वस्तुओं के समूहों को जनसंख्या कहा जाता है।
पी.वी. यंग के शब्दों में, ‘‘वह समान समूह जिसमें से प्रतिदर्श का चयन किया जाता है, जनसंख्या या समष्टि कहलाते हैं।’’
यंग, पी.वी.-मेथड्स इन साशियल रिसर्च, मेग्रोहिल कंपनी, न्यूयार्क, 1956
जनसंख्या के प्रकार
परिमित जनसंख्या
अपरिमित जनसंख्या
1. परिमित जनसंख्या- जब समष्टि परिसीमित होती है तो उसे परिमित जनसंख्या कहते हैं जैसे- विद्यालय, संस्था, फैक्ट्री आदि।
2. अपरिमित जनसंख्या- जब जनसंख्या दूर-दूर तक फैली होती है तब उसे अपरिमित जनसंख्या कहते हैं।
अध्ययन में प्रयुक्त जनसंख्या
प्रस्तुत शोध अध्ययन में जयपुर क्षेत्र के बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत शहरी व ग्रामीण महाविद्यालयों के शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों को लिया गया है। इस क्षेत्र में शहारी महाविद्यालय- 22 व ग्रामीण महाविद्यालय 24 हैं।
न्यादर्श-किसी भी अनुसंधानकर्ता के लिए यह संभव नहीं है कि पूरी जनसंख्या के समग्र व्यक्तियों को अपनी खोज का विषय बना सके इसलिए जनसंख्या में से वे कुछ ऐसी इकाईयों का चयन कर लेते हैं जो कि समग्र का प्रतिनिधि तत्व करें और जिन पर किए गए अध्ययन के आधार पर समग्र के लिए निष्कर्ष निकाले जा सके। अध्ययन के लिए चयनित व्यक्तियों के ऐसे समूह को न्यादर्श कहते हैं।
गुड व हाट के अनुसार, ‘‘एक न्यादर्श जैसे कि नाम से स्पष्ट है कि एक विस्तृत समूह का अपेक्षाकृत छोठा प्रतिनिधि है।’’
पी.वी. यंग के अनुसार, ‘‘एक सांख्यिकी प्रतिदर्श संपूर्ण समूह अथवा योग चयन का ही एक अति छोटा आकार का समूह है।
’’प्रस्तुत अध्ययन में न्यादर्श-
जयपुर क्षेत्र के ग्रामीण व शहरी बी.एस.टी.सी. महाविद्यालय के शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों को न्यादर्श के रूप में चुना है जिनकी संख्या 120 (60 महिला एवं 60 पुरूष ॅ) है।
पर्यावरण अवधारणा उपलब्धि परीक्षण- डाॅ. एस.के. बावा, इंदीरवीर कौर द्वारा निर्मित उपलब्धि परीक्षण (ई.सी.ए.टी.) द्वारा किया।
उपकरण की व्याख्या/विश्लेषण
अंक वर्ग
62 से अधिक उच्च पर्यावरण अवधारणा उपलब्धि परीक्षण।
45-62 सामान्य पर्यावरण अवधारणा उपलब्धि परीक्षण
45 से कम निम्न पर्यावरण अवधारणा उपलब्धि परीक्षण
इस परीक्षण में 62 कथन है इसमें बहुविकल्पात्मक व रिक्त स्थान दिये गये हैं। प्रश्नावली का फलांकन अपेक्षित सही उत्तर के लिए 1 अंक तथा गलत उत्तर के लिए 0(शून्य) अंक दिये गये हैं।
सांख्यिकी
सांख्यिकी एक ऐसी विधि है जो किसी क्षेत्र से संबंधित संख्यात्मक प्रदत्तों का अध्ययन विश्लेषण तथा विवेचन इस प्रकार से करती है कि उसके द्वारा भूतकालीन तथ्यों की वर्तमान तथ्यों से तुलना की जाती है अथवा भविष्य के लिए अनुमान निकाले जाते हैं। यहां यह ध्यान रखने की बात है कि सांख्यिकी कोई विज्ञान नहीं है वरन् यह केवल एक वैज्ञानिक विधि है। सांख्यिकी एक वैज्ञानिक विधि होने के कारण अनुमान लगाती है, अनुमानों की सत्यता को ज्ञात करती है और अंत में उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करती है।
अर्थात् हम कह सकते हैं कि सांख्यिकी वैज्ञानिक विधि की वह शाखा है जो प्रदत्तों का विवेचन करती है। सांख्यिकी का तात्पर्य केवल निरीक्षणों की प्राप्त राशि आदि प्रदत्त संग्रह करना और उनको भली प्रकार समझने हेतु सुसंगठित व सुव्यवस्थित करना है।
सांख्यिकी का अर्थ व परिभाषा
सांख्यिकी शब्द को अंग्रेजी में ैजंजपेजपब कहा जाता है। स्टैटिक्स लेटिन भाषा के शब्द स्टेट्स या इटली के शब्द स्टेटिस्टा से निकला है। इसका प्रयोग आरंभ में जन्म मरण की संख्याओं के विवरण का लेखा रखने के लिए किया गया था, परन्तु धीरे-धीरे यह राजनीतिक विषय ही नहीं रहा। इसका प्रयोग राज्य की आर्थिक व सामाजिक समस्याओं व परिस्थितियों तक फैल गया। वर्तमान में सांख्यिकी का प्रयोग विज्ञान, गणित, शिक्षा मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र आदि सभी ज्ञान के क्षेत्र में होता है।
लविट के अनुसार, ‘‘सांख्यिकी संख्यात्मक तथ्यों के संकलन, वर्गीकरण तथा सारणीयन से संबंधित एक अध्ययन है जो संबंधित घटनाओं का विवरण, विवेचन एवं तुलना करती है।’’
ब्लमर्स तथा लिण्डाक्विस्ट के अनुसार, ‘‘ सांख्यिकी पद्धतियां वे प्रणालियां हैं जिनके द्वारा संख्यात्मक अथवा परिमाणात्मक प्रदत्तों का संकलन तथा विवेचन किया जाता है।’’
फरगुसन के अनुसार, ‘‘ सांख्यिकी का संबंध सर्वेक्षणों और परीक्षणों द्वारा प्राप्त होने वाली सामग्री के संकलन, वर्गीकरण और व्याख्या से है।’’
लाटे के अनुसार, ‘‘ सांख्यिकी अनुसंधान का एक उपकरण है जिसका संबंध अंकित तथ्यों के संग्रह एवं व्याख्या की विधियों से है।’’
अध्ययन में प्रयुक्त सांख्यिकी
अनुसंधान का आधार तथ्यों का संकलन, विश्लेषण व निर्वचन होता है। तीनों कार्यों को सुचारू रूप से एकत्रित करने के लिए सांख्यिकी ज्ञान का प्रयोग किया जाता है। प्रत्येक शोधकार्य में सांख्यिकी विधियों द्वारा एकत्रित सूचनाओं व संकलित तथ्यों का विश्लेषण तथा व्याख्या की जाती है।
प्रस्तुत शोध में पूर्व निर्धारित उद्देश्यों के आधार पर सर्वेक्षण विधि का प्रयोग कर न्यादर्श का चयन किया गया है तथा परीक्षणों के माध्यम से संबंधित समंकों के विश्लेषण के लिए निम्नलिखित सांख्यिकी का प्रयोग किया गया-
1. मध्यमान
2. मानक विचलन
3. टी-परीक्षण
4. काई वर्ग परीक्षण (2 बाई 2)
प्रदत्तों का विश्लेषण एवं निर्वचन
शोध परीक्षण के प्रशासन तथा अंकन के पश्चात् प्रदत्तों का संकलन एवं व्यवस्थापन किया जाता है। संकलित प्रदत्त प्राप्त प्रदत्त के रूप में जाने जाते हैं। प्राप्त प्रदत्त जब तक अर्थपूर्ण नहीं होते जब तक कि उनका सांख्यिकी विश्लेषण नहीं किया जाता। प्रदत्तों के विश्लेषण का अर्थ प्राप्त प्रदत्तों को अर्थपूर्ण बनाना है अथवा उपयुक्त को प्राप्त करने के लिए प्रदत्तों के विश्लेषण की सहायता से परिकल्पनाओं का परीक्षण किया जाता है।
इस प्रकार प्रदत्तों के विश्लेषण के निम्नलिखित प्रमुख कार्य हैं-
- प्रदत्तों को अर्थपूर्ण बनाना।
- परिकल्पनाओं का परीक्षण करना।
- सार्थक परिणाम प्राप्त करना।
- अनुमान लगाना अथवा सामान्यीकरण करना।
-परा-सांख्यिकी के संबंध में अनुमान लगाना।
एक शोधकार्य द्वारा संपन्न किए गए अनुसंधान के प्रति वैज्ञानिक अधिकांशतः दो तथ्यों की ओर अपनी आलोचना अभिव्यक्ति करते हैं।
आंकडें
आंकडों का निर्वचन
आंकडों के निर्वचन का संबंध यहां उनके संकलन, संकेतीकरण, संवर्गीकरण, सारणीयन तथा विश्लेषण से है। एक अनुसंधान समस्या के संदर्भ में जहां तक तर्क संगत तथा संबंधित आंकडों के संकलन का संबंध है, इस विषय पर इस तथ्य को अधिकांशतः बल दिया जाता है कि वैज्ञानिक अध्ययनों में जिन प्रयोज्यों के माध्यम से आवश्यक सूचना का संकलन सम्पन्न किया जाता है, उनका चयन यथासंभव यादृच्छिक प्रक्रिया पर आधारित करना चाहिए क्योंकि यादृच्छिकरण द्वारा चयन की गई इकाइयां ही अपनी संबंधित समष्टि का प्रतिनिधि होती हैं।
किसी भी शोधकार्य में विभिन्न उपकरणों की सहायकता से प्राप्त सूचनाओं का कोई निष्कर्ष नहीं निकलता जब तक कि उनका विश्लेषण ना कर लिया जाए।
कुक के अनुसार, ‘‘वैज्ञानिक विश्लेषण अध्ययन तथ्यों परिणामों तथा वैज्ञानिक ज्ञान के संबंधों की खोज करता है।’’
प्रसिद्ध फ्रेन्च गणितज्ञ आकाटे के शब्दों में, ‘‘जिस प्रकार एक मकान पत्थरों से बनता है, उसी प्रकार विज्ञान का निर्माण तथ्यों से होता है परन्तु तथ्यों का केवल संकलन उसी भांति का विज्ञान नहीं है। जैसे पत्थरों का ढेर मकान नहीं है।’’
पी.वी. यंग के शब्दों में, ‘‘वैज्ञानिक विश्लेषण यह मानता है कि तथ्यों के संकलन के पीछे स्वयं तथ्यों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन और कुछ भी हेाता है। यदि इन सुव्यस्थित तथ्यों को संपूर्ण अध्ययन से संबंधित किया जाए तो उनका महत्वपूर्ण सामान्य अर्थ प्रकट हो सकता है, जिसके आधार पर घटना को प्रमाणित की जा सकती है।
इस कथन से तात्पर्य है कि अनुसंधान या शोधकार्य में केवल तथ्यों को एकत्र कर लेने से ही अध्ययन स्पष्ट नहीं हो जाता तब तक कि उन तथ्यों का वर्गीकरण व सारणीयन करने से बिखरे हुए तथ्यों के ढेर को एक क्रमबद्ध व संक्षिप्त रूप नहीं मिल जाता है जिसके कारण उन्हें सरलता से समझा जा सकता है। सारणीयन की योजना अंतिम रूप में सामग्री के संकलन के 42 चात् निश्चित होती है। वास्तव में इसी के द्वारा घटनाओं की व्याख्या, विवरण तथा तुलना के लिए तथ्यों का संकलन, वर्गीकरण व सारणीयन किया जाता है। शोधार्थी ने इनको लक्ष्यानुसार विश्लेषण करने के लिए सारणी में वर्गीकृत किया है।
सारणीयन द्वारा आंकडों में सरलता तथा स्पष्टता आती है तथा वर्णनात्मक और अधिक व्यवस्थित होकर प्रदर्शन के योग्य बन जाते हैं। इसके अंतर्गत आंकडों को विभिन्न स्तम्भों तथा पंक्तियों में प्रस्तुत कर सकते हैं जिससे समझने में सुविधा हो जाती है।
इसलिए शोधकर्ता ने अपनी तथ्यांक सामग्री को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करने तथा उसका विश्लेषण और व्याख्या करने का प्रयास भी किया है।
विश्लेषण तथा व्याख्या के लिए शर्तें-
शोधकर्ता को अपनी अन्तर्दृष्टि को स्पष्ट रखना चाहिए।
एक आलोचनात्मक एवं अनुशासित कल्पना शक्ति का विकास किया जाना चाहिए। पक्षपातों एवं मिथ्या सुझावों से स्वयं को दूर रखना चाहिए।
तथ्यों के विश्लेषण एवं व्याख्या के लिए आवश्यक तैयारियां-
सूचनाओं को क्रम से लगाया।उत्तरों की जांच। अनावश्यक तथ्यों को हटा दिया। केवल वांछित सामग्री ही विश्लेषण किया गया।
तथ्यों का वर्गीकरण
समग्र तथ्यों के विस्तृत तथा ठोस वर्गीकरण पर ही बहुत कुछ अध्ययन की प्रभावशीलता एवं मूल्य निर्भर करता है। तथ्यों का वर्गीकरण होने से उनकी तुलना, उनमें जाने वाली समानाताओं व भिन्नताओं तथा पारस्परिक संबंधों का ज्ञान हो जाता है। अतः तथ्यों का विश्लेषण व्याख्या की आत्मा है। अगर अव्यवस्थित तथा बिखरे हुए आंकडे होगें तो व्यावहारिक रूप में ना विश्लेषण किया जा सकेगा और ना ही निष्कर्ष निकालना संभव हो सकेगा। अतः संभव बनाने के लिए शोधकर्ता ने तथ्यों के ढेर को व्यवस्थित व क्रमबद्ध रूप प्रदान किया है।
तथ्यों का सारणीयन
शोधकर्ता ने तथ्यों को इस ढंग से सारणी में व्यवस्थित किया कि उनकी तुलनात्मक अध्ययन सफलतापूर्वक किया जा सके।
क ित्र 1 का काई तालिका मूल्य .05 एवं .01 स्तर पर क्रमशः 3.41 एवं 6.34 है। गणना करने पर काई का मूल्य .04 प्राप्त हुआ। यह मूल्य काई तालिका मूल्य के दोनों ही स्तरों से कम है। अतः निराकरणीय परिकल्पना ‘‘ बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत् शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणा के स्तरों में समानताऐं नहीं हैं’’, को स्वीकृत किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि बी.एस.टी.सी. में अध्ययनरत् छात्र व छात्राओं के पर्यावरण संबंधी अवधारणा में भिन्नताऐं नहीं है।
शहनवाज (1990) ने अपने अध्ययन ‘‘माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों व शिक्षकों में पर्यावरण जागरूकता व पर्यावरण अभिवृत्ति का अध्ययन’’ में अध्यापकों व छात्रों की पर्यावरण के प्रति जागरूकता व अभिवृत्ति का अध्ययन किया। इस अध्ययन में महिलाओं में पुरूषों की अपेक्षा पर्यावरणीय जागरूकता अधिक पाई गई।
रोली, सबलोक (1990) ने जिला जबलपुर के हाई स्कूल के शिक्षकों तथा छात्रों की पर्यावरणीय जागरूकता और अभिवृत्ति के संबंध में अध्ययन किया और पाया कि-
लडकियों और लडकों की पर्यावरण जागरूकता व पर्यावरणीय समस्याओं के प्रति अभिवृत्ति सार्थक रूप से भिन्न है।
जोशी (1991) ने उच्च माध्यमिक स्तर के वैज्ञानिक दृष्टिकोण एवं धार्मिक दृष्टिकोण वाले विद्यार्थियों की पर्यावरणीय चेतना का तुलनात्मक अध्ययन किया।
इन्होंने शोध निष्कर्ष में यह पाया कि उच्च वैज्ञानिक अभिवृतित्त वाले विद्यार्थियों की पर्यावरण वाले विद्यार्थियों की पर्यावरण चेतना कम होती है अर्थात् धार्मिक चेतना से पर्यावरण चेतना का ऋणात्मक संबंध है।
कौर हरजीत पान (1992) ने अपने शोध ‘‘प्रशिक्षित अध्यापकों की पर्यावरण शिक्षा व जनसंख्या शिक्षा के प्रति अभिवृत्ति का अध्ययन’’ किया। इस अध्ययन में पर्यावरण जागरूकता के प्रति महिला व पुरूष अध्यापकों की अभिवृत्ति में कोई अंतर नहीं है।
अरूण मेहता (1992) ने ‘‘केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड व राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में चलने वाली पर्यावरण सहशैक्षिक गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन किया।’’ इन्होंने निष्कर्ष में यह ज्ञात किया कि केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड एवं राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के विद्यालयों में चलने वाले पर्यावरण सहशैक्षिक, गतिविधियाँ एक सी है।
देवदया (1997), ‘‘वेदों में पर्यावरणीय शिक्षा का अध्ययन करना’’
उद्देश्य
1. वैदिक साहित्य में निहित पर्यावरण के प्रत्यय का अध्ययन करना।
2. वैदिक साहित्य में मानव और पर्यावरण के मध्य संबंधों का अध्ययन।
3. वैदिक साहित्य मंें पर्यावरण संरक्ष्ज्ञण का अध्ययन।
4. वैदिक साहित्य में निहित पर्यावरणीय शिक्षा का अध्यन।
निष्कर्ष अध्ययन द्वारा प्रदर्शित होता है कि वेदों में पर्यावरण के संदर्भ में जीवित और अजीवित प्राणियों और वस्तुओं में एक संतुलित और संगत पूर्ण संबंध समाहित हे।
मानव और पर्यावरण के मध्य संबंधों का वर्णन अत्यधिक दृढ़ व साथ ही साथ भावुकतापूर्ण भी है।
वेदों के अनुसार पर्यावरण का अत्यन्त अभिन्न अंग है और अपने शारीरिक, ज्ञानात्मक, संवेगात्मक, कलात्मक, आध्यात्मिक, धार्मिक और नैतिक विकास के लिए उस पर पूर्णतः निर्भर है।
वैदिक दर्शन के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य मात्र भाषण (शिक्षा) देना ही नहीं अपितु व्यक्ति के व्यवहार में पर्यावरणीय शिक्षा द्वारा गुणात्मक सुधार लाना है।
दिलीप पटेल (2001), ने अपने शोध ‘‘गुजरात के दांग जिले के प्राथमिक शिक्षकों की पर्यावरण जागरूकता का अध्ययन’’ में जिले के प्राथमिक शिक्षकों की पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अध्ययन’’ में जिले के प्राथमिक शिक्षा की पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अध्ययन किया। उन्होंने गुजरात के दांग जिले के 150 प्राथमिक शिक्षकों को स्तरीय आदर्श चयन के लिए छांटा। इस अध्ययन मेें स्वंय निर्मित उपकरण का उपयोग करके आंकड़े एकत्रित किये गये। आंकड़ो के विश्लेषण के लिए टी-टेस्ट का उपयोग किया गया।
निष्कर्ष पुरूष शिक्षकों का जागरूकता स्तर महिला शिक्षकों की अपेक्षा ऊँचा था।
जे.जिना जेम्स (2004), ने अपने शोध ‘‘क्या प्राथमिक स्कूल में विद्याथियों के जल प्रदूषण के प्रति जागरूकता का अध्ययन किया।
अध्ययन के मुख्य उद्देश्य निम्न थे-
1. समूह चर्चा के बाद छात्रों में जल प्रदूषण के प्रति जागरूकता में परिवर्तन का अध्ययन करना।
2. छात्र तथा छात्राओं में जल प्रदूषण की जागरूकता में अंतर का अध्ययन करना।
3. तमिल तथा मलयालम माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों में जल प्रदूषण की जागरूकता के विकास में अन्तर का अध्ययन करना।
इस अध्ययन में जो निष्कर्ष निकलें, वो ये दर्शा रहे थे कि समूह चर्चा क्षेत्र भ्रमण के बाद सभी छात्रों की जल प्रदूषण की जागरूकता में कोई सार्थक अन्तर नहीं है तथा जल प्रदूषण की जागरूकता का सीखने के माध्यम से कोई सम्बन्ध नहीं है।
अरूणा वर्मा एवं भूपेन्द्र निगम (2005) ने विद्याथियों की विज्ञान विषय के प्रति उपलब्धि पर पर्यावरणीय जागरूकता के प्रभाव का अध्ययन किया जिसमें शोधकर्ता ने निम्न उद्देश्य निर्धारित किएः-
1. क्या हाईस्कूल के बालक/बालिकाओं की विज्ञान विषय में शैक्षिक उपलब्धि पर्यावरणीय जागरूकता से प्रभावित होती है।
2. क्या हाईस्कूल के विद्यार्थियों की पर्यावरणीय जागरूकता के संदर्भ में विज्ञान की शैक्षिक उपलब्धि में लैंगिक भेद होता है। इस अध्ययन से निम्न निष्कर्ष प्राप्त किये गए।
पर्यावरणीय जागरूकता का बालक/बालिकाओं की विज्ञान विषय की शैक्षिक उपलब्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है क्योंकि उच्च पर्यावरणीय जागरूकता में बालक/बालिकाओं की विज्ञान विषय में शैक्षिक उपलब्धि निम्न पर्यावरणीय जागरूकता के बालक/बालिकाओं की अपेक्षाकृत उच्च है। अतः कहा जा सकता है कि विद्यार्थियों की विज्ञान विषय की शैक्षिक उपलब्धि लिंग से प्रभावित नहीं होती हे।
श्रीमती शकुन्तला (2006), ने बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों के पर्यावरणीय जागरूकता स्तर का तुलनात्मक अध्ययन विषय पर शोधकार्य किया। शोध का प्रमुख उद्देश्य बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना था। इस शोध के मुख्य निष्कर्ष निम्न प्राप्त हुए-62 प्रतिशत बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों का जागरूकता स्तर औसत है। 8 प्रतिशत जागरूकता स्तर निम्न है, 30 प्रतिशत बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों का पर्यावरण जागरूकता स्तर उच्च है। पुरूष व महिला बी.एस.टी.सी. प्रशिक्षणार्थियों का पर्यावरणीय जागरूकता का स्तर समान है।
निष्कर्ष
बी.एस.टी.सी. (प्राथमिक स्तर के शिक्षक-प्रशिक्षणार्थी) में अध्ययनरत् महिला एवं पुरूष शिक्षक प्रशिक्षणार्थियों का गणना मूल्य तालिका मूल्य से कम है। अतः महिला एवं पुरूष प्रशिक्षणार्थियों की पर्यावरण संबंधी अवधारणा के स्तरों में भिन्नताएँ नहीं है।
भावी शोध हेतु सुझाव
आगामी अध्ययन के लिए कुछ सुझाव निम्न रूप में प्रस्तुत किये जा सकते हैः-
1. प्रस्तुत अध्ययन केवल 120 छात्र-छात्राओं पर किया गया है। यदि यह अध्ययन एक बड़े न्यादर्श पर किया जाये तो अधिक विश्वसनीय परिणाम प्राप्त हो सकते है।
2. विभिन्न नगरों, महानगरों एवं उपनगरो के मध्य भी पर्यावरण अवधारणा के स्तरों पर तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
3. अंग्रेजी व हिन्दी माध्यम के विद्यालयों के छात्र एवं छात्राओं के मध्य भी पर्यावरणीय अवधारणा के स्तरों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
4. विभिन्न समूहों के आर्थिक एवं सामाजिक तथा धार्मिक स्तर के आधार पर भी पर्यावरणीय अवधारणा के स्तरों का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।
5. पर्यावरण से सम्बन्धित अन्य समस्याओं का भी अध्ययन किया जा सकता है जैसे जनसंख्या विस्फोट, औद्योगिक प्रगति एवं वैज्ञानिक विकास का पर्यावरण पर प्रभाव इत्यादि।
संदर्भ पत्र एवं पत्रिकायें
ऽ राय, पारसनाथ - अनुसंधान परिचय, लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, आगरा 1993
ऽ हेरिसन, एस.एम. - ए. बीबलोग्राफी आॅफ सोशल सर्वे, 1938, पृ.सं. 204
ऽ शिविरा पत्रिका विशेषांक - मई, जून 2008
ऽ नई शिक्षा: राष्ट्रीय शैक्षिक मासिक पत्रिका - 30 सितम्बर, 2009
ऽ ज्ीम म्कनबंजपवदंस त्मअपमू . ष्श्रंद 2001 . टवसण् 107
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ऽ ूूूण्पदकपंमदअपतवदउमदजचवतजंसण्वतह.पदध्पिस
ऽ राय. बी.के. - एन्वायरनमेन्टल एजूकेशन, काॅमनवेल्थ पब्लिकेशन, नई दिल्ली
ऽ सक्सेना, हरिमोहन - पर्यावरण एवं प्रदूषण राजस्थान, हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर।
ऽ वशिष्ठ, कमला- पर्यावरण शिक्षण, मैसर्स यूनिवर्सिटी बुक हाउस, प्रथम संस्करण, 2006
Received on 04.04.2013
Revised on 03.06.2013
Accepted on 12.06.2013
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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(3): July-September, 2013, 331-336